
राम बनवास से जब लौट के घर में आये...
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये.
आँख -से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा...
6 दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा...
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर को आये.
जगमगाते थे जहाँ राम के कदमो के निशान...
प्यार की कहकशा. लेती थी अंगडाइयां जहाँ...
मोड़ नफरत के उसी रहगुजर से आये.
धर्म क्या उनका है ? क्या जात है यह जानता कौन...
घर ना जलता तो.., उन्हें पहचानता कौन..
घर जलाने को मेरा.., लोग जो घर में आये...
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा ये खंजर..
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर...
है मेरे सर की खता. जख्म. जो सर में आये.
पाँव सरयू में अभी राम ने धोए भी ना थे....
की नजर आये वहाँ खून के गहरे धब्बे....
पाँव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे..
राजधानी की फिजा आई नहीं रास मुझे...
6 दिसंबर को मिला दूसरा वनवास मुझे.......
रचना.
कैफी आजमी.....
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