Saturday, September 18, 2010

दूसरा वनवास



राम बनवास से जब लौट के घर में आये...
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये.

आँख -से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा...
6 दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा...
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर को आये.

जगमगाते थे जहाँ राम के कदमो के निशान...
प्यार की कहकशा. लेती थी अंगडाइयां जहाँ...
मोड़ नफरत के उसी रहगुजर से आये.

धर्म क्या उनका है ? क्या जात है यह जानता कौन...
घर ना जलता तो.., उन्हें पहचानता कौन..
घर जलाने को मेरा.., लोग जो घर में आये...

शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा ये खंजर..
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर...
है मेरे सर की खता. जख्म. जो सर में आये.

पाँव सरयू में अभी राम ने धोए भी ना थे....
की नजर आये वहाँ खून के गहरे धब्बे....
पाँव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे..
राजधानी की फिजा आई नहीं रास मुझे...

6 दिसंबर को मिला दूसरा वनवास मुझे.......


रचना.
कैफी आजमी.....

Wednesday, September 1, 2010

परसाई कहिन...

भोलाराम का जीव
स्वर्गीय श्री हरिशंकर परसाई

ऐसा कभी नहीं हुआ था।

धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड में ही नहीं आरही थी। आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मख्खी चपेट में आगई। उसे निकालते हुए वे बोले, ''महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहां नहीं पहुंचा।''

धर्मराज ने पूछा, ''और वह दूत कहां है?''

''महाराज, वह भी लापता है।''

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बडा बदहवास-सा वहां आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत होगया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ''अरे तू कहां रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहां है?''

यमदूत हाथ जोडक़र बोला, ''दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया। आज तक मैने धोखा नहीं खाया था, पर इस बार भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पांच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह को त्यागा, तब मैंने उसे पकडा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की। नगर के बाहर ज्योंही मैं इसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्योंही वह मेरे चंगुल से छूटकर जाने कहां गायब होगया। इन पांच दिनों में मैने सारा ब्रह्यांड छान डाला, पर उसका पता नहीं चला।''

धर्मराज क्रोध से बोले, ''मूर्ख, जीवों को लाते-लाते बूडा हो गया, फिर एक मामूली आदमी ने चकमा दे दिया।''

दूत ने सिर झुकाकर कहा, ''महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी। मेरे अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके, पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।''

चित्रगुप्त ने कहा, ''महाराज, आजकल पृथ्वी पर इसका व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को फल भेजते है, और वे रास्ते में ही रेलवे वाले उडा देते हैं। होज़री के पार्सलों के मोज़े रेलवे आफिसर पहनते हैं। मालगाडी क़े डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उडा कर कहीं बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी किसी विरोधी ने, मरने के बाद, खराबी करने के लिए नहीं उडा दिया?''

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा, ''तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र गई। भला, भोलाराम जैसे दीन आदमी को किसी से क्या लेना-देना?''

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि वहां गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले, ''क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बेठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?''

धर्मराज ने कहा, ''वह समस्या तो कभी की हल हो गई। नरक में पिछले सालों से बडे ग़ुणी कारीगर गए हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं, जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाई। बडे-बडे इंजीनियर भी गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाज़री भरकर पैसा हडपा, जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गई, पर एक विकट उलझन आगई है। भोलाराम के नाम के आदमी की पांच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यमदूत यहां ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इसने सारा ब्रह्यांड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद ही मिट जाएगा।''

नारद ने पूछा, ''उस पर इनकम टैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने उसे रोक लिया हो।''

चित्रगुप्त ने कहा, ''इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।''

नारद बोले, ''मामला बडा दिलचस्प है। अच्छा, मुझे उसका नाम, पता बतलाओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूं।''

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर बतलाया - ''भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर के घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ क़मरे के टूटे-फूटे मकान पर वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लडक़े और एक लडक़ी। उम्र लगभग 60 वर्ष। सरकारी नौकर था। पांच साल पहले रिटायर हो गया था, मकान का उस ने एक साल से किराया नहीं दिया था इसलिए मकान-मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने मे भोलाराम ने संसार ही छोड दिया। आज पांचवां दिन है। बहुत संभव है कि, अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इसलिए आपको परिवार की तलाश में घूमना होगा।''

मां बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहिचान गए।

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज़ लगाई, ''नारायण नारायण !'' लडक़ी ने देखकर कहा, ''आगे जाओ महाराज।''

नारद ने कहा, ''मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी मां को ज़रा बाहर भेजो बेटी।''

भोलाराम की पत्नी बाहर आई। नारद ने कहा, ''माता, भोलाराम को क्या बिमारी थी?

''क्या बताऊं? गरीबी की बिमारी थी। पांच साल हो गए पैन्शन पर बैठे थे, पर पेन्शन अभी तक नहीं मिली। हर 10-15 दिन में दरख्वास्त देते थे, पर वहां से जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेन्शन के मामले पर विचार हो रहा है। इन पांच सालों में सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा। फाके होने लगे थे। चिन्ता मे घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड दिया।''

नारद ने कहा, ''क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी।''

''ऐसा मत कहो, महाराज। उम्र तो बहुत थी। 50-60 रूपया महीना पेन्शन मिलती तो कुछ और काम कहीं करके गुज़ारा हो जाता। पर क्या करें? पांच साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौडी नहीं मिली।''

दुख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आए, ''मां, यह बताओ कि यहां किसी से उनका विषेश प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?''

पत्नी बोली, ''लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से होता है।''

''नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, कोई स्त्री?''

स्त्री ने गुर्राकर नारद की ओर देखा। बोली, ''बको मत महाराज ! साधु हो, कोई लुच्चे-लफंगे नहीं हो। जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री को आंख उठाकर नहीं देखा।''

नारद हंस कर बोले, ''हां, तुम्हारा सोचना भी ठीक है। यही भ्रम अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा माता, मैं चला।'' व्यंग्य समझने की असमर्थता ने नारद को सती के क्रोध की ज्वाला ने बचा लिया।

स्त्री ने कहा, ''महाराज, आप तो साधु हैं, सिध्द पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रूकी पेन्शन मिल जाय। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए?''

नारद को दया गई। वे कहने लगे, ''साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहां कोई मठ तो है नहीं? फिर भी सरकारी दफ्तर में जाऊंगा और कोशिश करूंगा।''

वहां से चलकर नारद सरकारी दफ्तर में पहुंचे। वहां पहले कमरे में बैठे बाबू से भोलाराम के केस के बारे में बातें की। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला, ''भोलाराम ने दरखास्तें तो भेजी थीं, पर उनपर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड ग़ई होंगी।''

नारद ने कहा, ''भई, ये पेपरवेट तो रखे हैं, इन्हें क्यों नहीं रख दिया?''

बाबू हंसा, ''आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरखास्तें पेपरवेट से नहीं दबती। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।''

नारद उस बाबू के पास गये। उसने तीसरे के पास भेजा, चौथे ने पांचवें के पास। जब नारद 25-30 बाबुओं और अफसरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा, '' महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड ग़ए। आप यहां साल-भर भी चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधा बडे साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया, तो अभी काम हो जाएगा।''

नारद बडे साहब के कमरे में पहुंचे। बाहर चपरासी ऊंघ रहे थे, इसलिए उन्हें किसी ने छेडा नहीं। उन्हें एकदम विजिटिंग कार्ड के बिना आया देख साहब बडे नाराज़ हुए।बोले, इसे कोई मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धडधडाते चले आए ! चिट क्यों नहीं भेजी?''

नारद ने कहा, ''कैसे भेजता, चपरासी सो रहा है।''

''क्या काम है?'' साहब ने रौब से पूछा।

नारद ने भोलाराम का पेन्शन-केस बतलाया।

साहब बोले, ''आप हैं बैरागी। दफ्तरों के रीत-रिवाज नहीं जानते। असल मे भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी मन्दिर है। यहां भी दान-पुण्य करना पडता है, भेंट चढानी पडती है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्तें उड रही हैं, उन पर वज़न रखिए।''

नारद ने सोचा कि फिर यहां वज़न की समस्या खडी हो गई। साहब बोले, ''भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेन्शन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है। देर लग जाती है। हज़ारों बार एक ही बात को हज़ारों बार लिखना पडता है, तब पक्की होती है। हां, जल्दी भी हो सकती है, मगर '' साहब रूके।

नारद ने कहा, ''मगर क्या?''

साहब ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, ''मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आप की यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लडक़ी गाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूंगा। साधु-संतों की वीणा के अच्छे स्वर निकलते हैं। लडक़ी जल्दी संगीत सीख गई तो शादी हो जाएगी।''

नारद अपनी वीणा छिनते देख ज़रा घबराए। पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा टेबिल पर रखकर कहा, ''लीजिए। अब ज़रा जल्दी उसकी पेन्शन का आर्डर निकाल दीजिए।''

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाजिर हुआ।

साहब ने हुक्म दिया, ''बडे बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ।''

थोडी देर बाद चपरासी भोलाराम की फाइल लेकर आया। उसमें पेन्शन के कागज़ भी थे। साहब ने फाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा, ''क्या नाम बताया साधुजी आपने!''

नारद समझे कि ऊंचा सुनता है। इसलिए ज़ोर से बोले, ''भोलाराम।''

सहसा फाइल में से आवाज़ आई, ''कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पेन्शन का आर्डर गया क्या?''

साहब डरकर कुर्सी से लुढक़ गए। नारद भी चौंके। पर दूसरे क्षण समझ गए। बोले, ''भोलाराम, तुम क्या भोलाराम के जीव हो?''

''हां।'' आवाज़ आई।

नारद ने कहा, ''मैं नारद हूं। मैं तुम्हें लेने आया हूं। स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।''

आवाज़ आई, ''मुझे नहीं जाना। मैं तो पेन्शन की दरखास्तों में अटका हूं। वहीं मेरा मन लगा है। मैं दरखास्तों को छोडक़र नहीं सकता।''

सब फिक्स है...



घर के बड़े बुड़ो से सुना था की पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब। पर है मजाल की आज कोई भी आदर्श माँ बाप अपने बच्चो से ऐसा कहेगा, अब तो लोग अपने बच्चो बच्चियों को प्रोत्साहित करते है, बच्चा अगर लड़का हुआ तो सचिन, सहवाग, धोनी और बच्ची हुई तो सोनिया, नेहवाल, अंजुम और झूलन बनेगी॥
कितना बदलाव आया है समाज के तानेबाने में, खैर जब चर्चा हो ही रही है तो इसी बहाने कुछ और बातें भी हो जाये जाये तो कैसा रहे,, है ना। ऐसा नहीं है की खेलो और खेलने वालो को को बस शोहरत ही नसीब होती है,, अरे साहब ये नसीब है नसीब,, कब बदल जाये इसे खुद ही नहीं मालूम रहता है, ताजा वाकया ही देख लीजिये गिल्ली डंडे के आधुनिक स्वरुप ( क्रिकेट ) के कुछ अति उत्साही खिलाडियों ने मैच ही फिक्स कर दिया कुछ वैसे ही जैसे बिना एक्साम के ही पप्पू पास है या फेल सब पता चल गया, अरे भाई साहब गजब का हंगामा मचा है पुरे देश में, जैसे रिजर्व बैंक का खजाना लूट गया हो और इस बार तो बात गैर मुल्क की थी और मुल्क भी वैसा जो लहू में दुश्मनी के लिए ही दौड़ता है सो सभी को बैठे बैठे बहाना मिल गया खूब चर्चाये हुई, मीडिया, मंत्री और आम मानस भी अपनी प्रबुद्धता दिखने लगा, मीडिया को अलादीन का चिराग मिल गया, मंत्री को कुर्शी का हिसाब और आम जनता तो ऐसा लग रहहा है जैसे उसे इस सूखे,बाढ़ और महंगाई से मुक्ति मिल गई है सभी मिल कर फिक्सिंग धून गा रहे रहे है।
पर मेरी इस छोटी सी अक्ल में ये बात नहीं आ रही है की इतना हंगामा किसके , भाई मैच ही तो फिक्स था ना जिन्दगी तो नहीं, भाई खेलो का तो हिसाब किताब फिल्मो जैसा है बस मनोरंजन, जब हमारी फिल्मो में सब फिक्स होता है कब हीरो मार खायगा, कब रोयेगा, हिरोइन कितने कपडे पहनेगी कहा नाचेगी, उस वक़्त तो हम नहीं कहते है ना की सब फिक्स था, क्यों गलत कहा क्या ? भाई भावनावो के जुडाव का भी अजीब खेल है, हमारी भावना को ठेस तभी पहुँचती है जब हमारा कोई खिलाडी पैसे लेकर मैच फिक्स कर देता है नहीं तो हमारी भावनाए हमारी गोद में सोई रहती है,,,,, मगर उस फिक्सिंग का क्या करे जो रोज हो रही है।
नेताओ की कुर्र्शी पहले से फिक्स है, अफसरों का प्रोमोसन पहले से फिक्स है, सरकारी नौकरिया पहले से फिक्स है, इन्जिनीरिंग और मेडिकल कॉलेज की साईट पहले से फिक्स है, हस्पताल में बिस्तर पहले से फिक्स है, अजी और नहीं तो हमारा कीमती वोट भी पहले से फिक्स है, अरे भाई जब सब कुछ पहले से ही फिक्स है तो बेचारे खिलाडियों पर ही इतना गुस्सा क्यों ? शायद इस लिए की हमारी प्यारी जनता अपना कीमती समय बर्बाद कर इन्हें देखती है इसलिए ही ना इतना लगाव है। तो अब सोचने की बात ये है की अगर इस लगाव का अगर आधा हिस्सा भी अगर हम उन फिक्सिंगो का खेल देखने में लगते तो शायद देश और कहा पहुँच गया होता, नेता पैसे खा कर पेट भरे कोई बात नहीं,, अफसर पैसे से घर भरे हमें मतलब नहीं,,लोग भूखे मरे छोडो यार,,, हम तो बस खेल और खिलाडियों को ही गलियां देना जानते है, उन्हें कोशेंगे धरना देंगे की उन्हें बाहर कर दो,, फांसी पर लटका दो,,पर एक लब्ज भी नहीं कहेंगे अपने निक्कमे नेतावो को की कुर्शी छोड़ दो,, नहीं कहेंगे अफसरों को की बाहर आ जाओ,,, क्योंकि हम मजबूर है, मै मजबूर हूँ, आप मजबूर है। क्यों की हम सब फिक्स है कभी धर्म के नाम पर तो, कभी जाति के नाम पर, कभी अपनों तो कभी गैर के नाम पर, ये पुरा समाज पूरा देश फिक्स है, कौन है जो इन्हें फिक्स कर रहा है शायद हुम ही है वो फिक्सर जो सब फिक्स करते है, सोचता हूँ क्यों ना हम सभी को देश से बाहर कर दिया जाय या फिर फांसी दी जाय,,,,,,,, काश हम सभी को फांसी दे दी जाती और फिर से नई दुनिया बसाई जाती,,..... इन फिक्सरो की फिक्सिंग से दूर बहूत दूर,,,,पर उम्मीद मर रही है,,,, शायद ये होना या ना होना भी फिक्स है,.,