Wednesday, September 1, 2010

सब फिक्स है...



घर के बड़े बुड़ो से सुना था की पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब। पर है मजाल की आज कोई भी आदर्श माँ बाप अपने बच्चो से ऐसा कहेगा, अब तो लोग अपने बच्चो बच्चियों को प्रोत्साहित करते है, बच्चा अगर लड़का हुआ तो सचिन, सहवाग, धोनी और बच्ची हुई तो सोनिया, नेहवाल, अंजुम और झूलन बनेगी॥
कितना बदलाव आया है समाज के तानेबाने में, खैर जब चर्चा हो ही रही है तो इसी बहाने कुछ और बातें भी हो जाये जाये तो कैसा रहे,, है ना। ऐसा नहीं है की खेलो और खेलने वालो को को बस शोहरत ही नसीब होती है,, अरे साहब ये नसीब है नसीब,, कब बदल जाये इसे खुद ही नहीं मालूम रहता है, ताजा वाकया ही देख लीजिये गिल्ली डंडे के आधुनिक स्वरुप ( क्रिकेट ) के कुछ अति उत्साही खिलाडियों ने मैच ही फिक्स कर दिया कुछ वैसे ही जैसे बिना एक्साम के ही पप्पू पास है या फेल सब पता चल गया, अरे भाई साहब गजब का हंगामा मचा है पुरे देश में, जैसे रिजर्व बैंक का खजाना लूट गया हो और इस बार तो बात गैर मुल्क की थी और मुल्क भी वैसा जो लहू में दुश्मनी के लिए ही दौड़ता है सो सभी को बैठे बैठे बहाना मिल गया खूब चर्चाये हुई, मीडिया, मंत्री और आम मानस भी अपनी प्रबुद्धता दिखने लगा, मीडिया को अलादीन का चिराग मिल गया, मंत्री को कुर्शी का हिसाब और आम जनता तो ऐसा लग रहहा है जैसे उसे इस सूखे,बाढ़ और महंगाई से मुक्ति मिल गई है सभी मिल कर फिक्सिंग धून गा रहे रहे है।
पर मेरी इस छोटी सी अक्ल में ये बात नहीं आ रही है की इतना हंगामा किसके , भाई मैच ही तो फिक्स था ना जिन्दगी तो नहीं, भाई खेलो का तो हिसाब किताब फिल्मो जैसा है बस मनोरंजन, जब हमारी फिल्मो में सब फिक्स होता है कब हीरो मार खायगा, कब रोयेगा, हिरोइन कितने कपडे पहनेगी कहा नाचेगी, उस वक़्त तो हम नहीं कहते है ना की सब फिक्स था, क्यों गलत कहा क्या ? भाई भावनावो के जुडाव का भी अजीब खेल है, हमारी भावना को ठेस तभी पहुँचती है जब हमारा कोई खिलाडी पैसे लेकर मैच फिक्स कर देता है नहीं तो हमारी भावनाए हमारी गोद में सोई रहती है,,,,, मगर उस फिक्सिंग का क्या करे जो रोज हो रही है।
नेताओ की कुर्र्शी पहले से फिक्स है, अफसरों का प्रोमोसन पहले से फिक्स है, सरकारी नौकरिया पहले से फिक्स है, इन्जिनीरिंग और मेडिकल कॉलेज की साईट पहले से फिक्स है, हस्पताल में बिस्तर पहले से फिक्स है, अजी और नहीं तो हमारा कीमती वोट भी पहले से फिक्स है, अरे भाई जब सब कुछ पहले से ही फिक्स है तो बेचारे खिलाडियों पर ही इतना गुस्सा क्यों ? शायद इस लिए की हमारी प्यारी जनता अपना कीमती समय बर्बाद कर इन्हें देखती है इसलिए ही ना इतना लगाव है। तो अब सोचने की बात ये है की अगर इस लगाव का अगर आधा हिस्सा भी अगर हम उन फिक्सिंगो का खेल देखने में लगते तो शायद देश और कहा पहुँच गया होता, नेता पैसे खा कर पेट भरे कोई बात नहीं,, अफसर पैसे से घर भरे हमें मतलब नहीं,,लोग भूखे मरे छोडो यार,,, हम तो बस खेल और खिलाडियों को ही गलियां देना जानते है, उन्हें कोशेंगे धरना देंगे की उन्हें बाहर कर दो,, फांसी पर लटका दो,,पर एक लब्ज भी नहीं कहेंगे अपने निक्कमे नेतावो को की कुर्शी छोड़ दो,, नहीं कहेंगे अफसरों को की बाहर आ जाओ,,, क्योंकि हम मजबूर है, मै मजबूर हूँ, आप मजबूर है। क्यों की हम सब फिक्स है कभी धर्म के नाम पर तो, कभी जाति के नाम पर, कभी अपनों तो कभी गैर के नाम पर, ये पुरा समाज पूरा देश फिक्स है, कौन है जो इन्हें फिक्स कर रहा है शायद हुम ही है वो फिक्सर जो सब फिक्स करते है, सोचता हूँ क्यों ना हम सभी को देश से बाहर कर दिया जाय या फिर फांसी दी जाय,,,,,,,, काश हम सभी को फांसी दे दी जाती और फिर से नई दुनिया बसाई जाती,,..... इन फिक्सरो की फिक्सिंग से दूर बहूत दूर,,,,पर उम्मीद मर रही है,,,, शायद ये होना या ना होना भी फिक्स है,.,

No comments:

Post a Comment